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RAMPUR NEWS. गौरीपुर के सुरेंद्र तिवारी नेताजी नहीं रहे, उनका अंतिम संस्कार मणिकर्णिका घाट पर हुई

RAMPUR. जौनपुर जिले के मड़ियाहूं तहसील के गौरीपुर सिरौली गांव निवासी हिंदूवादी, मिलनसार व्यक्तित्व के धनी, आत्मबली, मधुर व्यवहार और गरीबों के मसीहा सुरेंद्रनाथ तिवारी “नेताजी” नहीं रहे। उन्होंने अपना अंतिम सांस कल दोपहर बीएचयू में इलाज के दौरान लिया। श्री तिवारी 50 वर्ष के थे। देर शाम शव घर आते ही परिजनों में कोहराम मच गया। उनका अंतिम संस्कार वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर हुआ। मुखाग्नि उनके बड़े पुत्र ने दिया।
परिजनों की माना जाए तो सुरेंद्रनाथ तिवारी को दो दिन पहले हृदय में पिड़ा हुई तो उन्हें बीएचयू में बेहतर इलाज के लिए भर्ती कराया गया जहां डॉक्टरों ने हृदय के अंदर एक नली जाम होने की बात बताई जिसकी साइकिलिंग के लिए उन्हें बुधवार को ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया। बताया जाता है कि अभी डॉक्टर उन्हें दो-तीन इंजेक्शन दिया था इसी बीच उन्हें हृदयघात हो गया डॉक्टर ने काफी प्रयास किया लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका और उनकी हृदयगति रुकने से मौत हो गई। मौत की सूचना जैसे ही आपरेशन थिएटर के बाहर परिजनों को मिला तो परिजनों में कोहराम मच गया। धीरे-धीरे यह सूचना उनके गृह गांव होते हुए रामपुर बाजार तक पहुंची तो लोग स्तब्ध रह गये थोड़ी देर बाद ही शोक संवेदना व्यक्त करने वालों का उनके गौरीपुर निवास पर तांता लग गया। देर रात उनका अंतिम संस्कार वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर किया गया।
सुरेंद्रनाथ तिवारी अपनी तीन भाइयों में दूसरे नंबर के थे। उनकी एक बेटा और एक बेटी है। उनके व्यवसाय की बात किया जाए तो श्री तिवारी चोपन में क्रेशर से गिट्टी तोड़ने का बिजनेस करते थे। अपनी बिजनेस को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने ट्रांसपोर्ट में कदम बढ़ाया। देखते ही देखते वह कई ट्रकों के मालिक बन गए। इसके बाद 12 वर्ष पूर्व गौरीपुर सिरौली गांव से निकलकर रामपुर बाजार में अपना कदम रखा और एक आवास बनवाया। जिसके कारण काफी समय रामपुर बाजार में देने लगे इसके बाद अपनी आवास से गरीबों, मजलूमों, असहायों का मदद करने के कारण आवाजाही बढ़ गया। जिसके बाद उनको अपने चाहने वालों ने हिंदूवादी और नेताजी का नाम दिया। जो बाद में चलकर सुरेंद्र नाथ तिवारी नेताजी के नाम से विख्यात हुए। नेताजी ब्राह्मण होते हुए जातिगत और दलगत में विश्वास नहीं करते थे। जिसके कारण ब्राह्मणों के साथ कभी खड़े होते नहीं देखे गए। 2-4 ब्राह्मण ही उनके आवास पर दिखाई पड़ते थे। बाकी सब अदर कास्ट के हिंदू उनके विश्वास पात्र और चहेते थे। नेताजी किसी ब्राह्मण संगठन अथवा किसी समाज के सदस्य नहीं थे लोगों की दुःखों को दूर करने और उनकी तकलीफों की सुनने की क्षमता ने उन्हें मानवाधिकार संगठन से जुड़ने का मौका दिया और अध्यक्ष के रूप में हर गरीब की सेवा में विश्वास करने लगे थे। नेताजी रामपुर नगर पंचायत चुनाव में बतौर प्रत्याशी के रूप में भी खड़े हुए। जिन्हें 114 मत पाकर करारी हार मिली। जिसकी तीस उन्हें कांटे की तरह चुभती रहती थी। चुनाव की बात पर नेताजी के अति करीबी रहे चंद्रेश दुबे बताते हैं नेताजी जातिगत और दलगत राजनीति से पूरी तरह दूर रहना चाहते थे उन्हें रामपुर नगर पंचायत के कुछ ब्राह्मण बिरादरी को छोड़ दिया जाए तो उनका व्यवहार ब्राह्मणों को अच्छा नहीं लगता था क्योंकि वह सर्व समाज के नेता बनना चाहते थे केवल ब्राह्मणों के नेता नहीं कहलाना चाहते थे जिसके कारण उन्हें चुनाव में महज 114 मत मिला और उन्हें करारी हार देखने को ‌मिली।
फिलहाल नेताजी की मौत ने क्षेत्र को झकझोर दिया है और उनके मिलनसार व्यवहार को याद कर स्तब्ध है। परिजनों में मानों दुःखों का पहाड़ अचानक आ गिर पड़ा हो। ऐसे में बीआरसी 24 न्यूज़ परिवार इस दुःख की घड़ी को सहने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता है कि उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।

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